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कोई साहिल मिला नहीं

कोई दीवाना आज डाकिया बनकर आया है

ग़ालिब-मीर सा फनकार बन जाये

सुलाया है खुद को

इश्क़ का इज़हार भी तो चाहिये

कलम भी तेरी गुलाम हो जाये।

मेरे कुछ फूल उसने अपने दिल मे भी बोया था

नूर की बारिश

एक तेरी खूशबू आये

बीमार हो जाये

नज़रो को हटाये की दिल को बचाये