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किनारे जा रहे है

अंजुमन  के सितारे अब इश्क़ से उतारे जा रहे है नदियों को मझधार में छोड़ कर किनारे जा रहे है कभी इंतजार करके तो कभी उनपे एतबार करके हम अपने जिस्म से जाँ  कुछ यू निकाले जा रहे है उनके नाम पर लिखी ग़ज़लें पढ़ पढ़ कर इलाही महफिलों में अपने अपने  मेयार सवारें जा रहे है ना  जाने  कितनी शीतल है उस दरख्त की हवा उसी की छांव में बिखरने सारे के सारे जा रहे है जिन्हें सीने में छुपाकर रखा था उम्र भर हमने, वही एहसास अब दुनिया में उछाले जा रहे है।  ख़ामोशियों का फ़ायदा कुछ इस तरह उठाकर, वो अपने हर गुनाह  हम  पर  उधारे जा रहे हैं। हमारे हिस्से की धूपें भी समेटी जा चुकीं कब की, अब उनके नाम के बादल भी निखारे जा रहे हैं। तेरे दीदार की हसरत में गुज़ारी उम्र सारी, मगर अब ख़्वाब भी आँखों से हमारे जा रहे हैं। कभी जो इश्क़ में डूबे थे समंदर की तरह इलाही, वही क़तरा-क़तरा होकर किनारे जा रहे हैं।

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पूस महीने के लिए

जो हम दोनों ने मांगा था

रिश्तों को भी अंजान बना डाला

कोई बहाना बना दे

छूने की गुजारिश आ जाए

मुझ माही से मिलने आज मेरा आब आए,

हमको क्या बताना है

सभी के भी दिलों में रहा करो

पर रातों जैसी अब रातें नहीं होती

अपने यार बदल देती है