पूस महीने के लिए
सैकड़ों बूंद लहू बहाए एक कतरा पसीने के लिए, कितने दरिया पार किए एक छोटे सफ़ीने के लिए। अब सब कुछ पाकर तू क्या ही कर लेगा बावरे, कुछ ख़्वाहिशें तो अधूरी रख ज़िंदगी जीने के लिए। महफ़िल है, मैख़ाना है, साक़ी है और पैमाना है, अब शाम का इंतज़ार कौन करे दो घूँट पीने के लिए। मुर्शिद, कुछ तुरपाई का हुनर मुझको भी सिखा दे, मेरे कश्कोल में बहुत ज़ख्म पड़े हैं सीने के लिए। सूरज से चुराई गर्मी का रोब न रखना इलाही, कुछ ताब हमने भी सहेज रखें है पूस महीने के लिए। ख़ुद ही काँधे पर उठाए फिरते हैं अपनी नाकामियों को कौन बैठा है यहाँ किसी और के जख्म सीने के लिए।