इंकलाब इस हवा में है
जंग ए हकूक अब अपनी सूरत ए इंतेहा में है
सब्र ए तूफां लिए , इंकलाब इस हवा में है
सच बोलने की क़ीमत यहाँ क़ैद-ओ-बंद है,
मुल्क अब भी दौर-ए-सितम के इम्तिहाँ में है।
मजलिसों के रहनुमाई के हम नहीं मुताशिर
हमारी जंग तख़्त से नहीं, ज़ुल्म-ओ-जफ़ा से है।
क़ैद-ओ-जिस्म खामोश कर नहीं सकी तखरीरें
अतिश ए इंकलाब अभी भी मुल्क की ज़बाँ में है।
ऐवान-ए-सल्तनत को रहेगा ये ग़ुरूर कब तक,
हर दौर का ज़ालिम इस अंजाम-ए-फ़ना में है।
तख़्तों को क्या ख़बर, है क्या वक़्त का तक़ाज़ा,
इस दौर का फ़ैसला भी अब हमारी रज़ा में है


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