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फलक से उतारे गए

इश्क दी लाग

मुझको भी खबर है

गुलिस्तां महरूम है

किताब दिया जाए

प्यार दुबारा तिबारा किया था

फिर से कुछ अपनी सुनाऊं मैं

पैरहन की खुशबू

जंजीर दे देना

निशाने खत्म हो चुके है

इस मुसाफिर को फिर कहां पाओगी।।