आग को गले लगाए बैठा हूँ

उसकी  लौ से  अपने  हाथो  को जलाए  बैठा हूँ
मैं फिर भी उस  आग को गले से  लगाये बैठा हूँ

जनता हूँ उसने बाख़बर किया है मेरे दुश्मनों को
फिर भी उसे  मैं  अपना  हमराज  बनाये बैठा हूँ

वो सोचता है कि मुझे  उससे कोई शिकवा  नही
वो बदनाम न हो इसलिए खामोशी लगाए बैठा हूँ

ये जनता  हूँ कि उसको कोई कद्रदान न  मिलेगा
इस डर से उसकी हरकतें सीने में छुपाये बैठा  हूँ

कुछ पल की रोशनी नसीब हो उसके घर को भी
बस इसी खातिर मैं अपना घर भी जलाए बैठा हूँ

एक मैं ही काफी हूँ उसकी याद में जलने के लिए
फ़क़त यही सोचके घर के दिए को बुझाए बैठा हूँ

ये उसकी मर्जी मुझको अपना बनाये या न बनाये
पर मैं तो सिर्फ उसी को ही अपना बनाये  बैठा हूँ

यही  सोचता  हूँ की कभी वो भी तो वफ़ा करेगी 
बस इसी आस में उसकी बेवफाई भुलाए बैठा हूँ






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