थोड़ा और

ये थोड़ा  मेरे नाम का है, और थोड़ा  तुम्हारे नाम का होगा
ये जहर जो लाये हो  हाकिम की मजहबी दुकान का होगा

वो वक़्त  ही कुछ  और  था जब तुम आलमगीर थे, अब तो
जो तौर तुम्हारी जुबां का है वही तौर मेरी ज़ुबान का होगा

जो जमीन पे  मिलोगे तो हमारे भी पाँव जमीन पे ही रहेंगे
जो उड़ने की बाते होंगी तो मेरा रौब भी आसमां  सा होगा

बाजार  में बिक रहे मलबे की बोली क्या खूब लगा रहे हो
सुनो आज ये हमारा  है  कल  तुम्हारे भी मकान का होगा

इन अखबारो के चंद पन्नो पर ऐताबर ही क्या करना हमको
इनकी स्याहियाँ बिकी हुई है इनकी खबरे सरकारी जुबान है

तुम्हारी फिदरत देखकर  लगता है ये अमीरी  पुश्तैनी नही
बल्कि किसी मुल्क के साहेब की जीहुज़ूरी का इनाम होगा



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