इकलौता खजाना हो

वीरानियों के दौर में जीने का एक हसीन बहाना हो
नई उम्मीद लिए तुम, ख्वाब मेरा बरसो पुराना हो


कैसे हवाले कर दूं, तुझको मैं किसी और के जाना
इस फ़कीं के असासे का तुम इकलौता खजाना हो


किस तरह भुला दूं मैं तुम्हे दिल ए बेज़ार से जाना
तुम मेरी पहली गजल का आखिरी फसाना हो


कैसे समेट लूं तुम्हे चंद लफ्जों में इस कागज पर
इब्तिदा भी , इंतेहा भी, और मुकम्मल ज़माना हो


उनकी आगोश में सर रखना कुछ ऐसा है इलाही
जैसे दर बदर बंजारे को मिला कोई ठिकाना हो


चलो आज दिल की बिखरी तहरीरें समेत लें यूं
जैसे रूह के जख्मों पे रहमते मरहम लगाना हो



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