उसको जार ए चमन लिखा है

आंखों को उसकी मीर का कोई  ग़ज़ल लिखा है
खुद को बियाबां , उसको जार ए चमन लिखा है

अब कोई  आकर  जरा हमारे  हुज़रे  में  देखे तो
हमने  कागजो पर  भी कई  ताजमहल  लिखा है

जो मुमकिन  हो  तो पढ़  लेना  उसे उसके जैसा
इन किताबों में हमने  उसपे कई सुखन लिखा है

जो एक दफा पढ़ ले,  तो पंडित हो जायें इलाही
मुसब्बिर ने उसके बदन  को इस  क़दर लिखा है

उसके होठों को मैखाना,उसके बिंदिया को हाट 
और उसकी  आंखों को ये  सारा शहर  लिखा है

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