कौन जाने

कौन जाने मेरे मुसब्बिर की अब रज़ा क्या है
इस इश्क ए इंतेहा में जाने मेरी खता क्या है

एक तेरा सजदा ही मेरी इबादत बन गई है
अब तेरे आगे ये जहां क्या है,ये खुदा क्या है

जां तो कब की जा चुकी तेरे जाने के बाद
कोई बताए अब भी गले में ये फंसा क्या है

हर तरफ बेचैनी,बेफिक्री और बेताबी छाई है
खुदा तू ही बता मेरे इस मर्ज की दवा क्या है

घर फूंक दिया हमने तेरे ख्वाबों के साथ
जरा सोच अब चिता से उठता धुआं क्या है

दिल की बस्ती एक तेरे रहने से रोशन थी 
वरना अब इस वीरान शहर में बचा क्या है

खामोशी ने मुझे वीरानो का घर कर दिया
अब सूनी रातों में जलती ये दिया क्या है

दिल सब्र से कब का थक चुका है इलाही
ना जाने सीने में अब भी धड़कता क्या है

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