पर रातों जैसी अब रातें नहीं होती


दिन गुजरता है शामें कटती है, मगर चंद बातें नहीं होती
नींद तो आ जाती है, पर रातों जैसी अब रातें नहीं होती


यूं ही अलमारी में बेबस पड़ी बस मुझे झांकती रहती है 
पहले जैसे मेरी इन किताबों से अब मुलाकाते नहीं होती


अब सावन में भी अपना ये हाल ए उल्फत है इलाही
बिजली कड़कड़ी है, बादल आते है, बरसाते नहीं होती


खबर ये मिली है मुझको भी तुम्हारे भी कुछ ख़ुदाओं से
की अब तेरी दुआ में मेरी लिए कोई फ़रियादें नहीं होती


जिसे चाहे गुनाहगार बना दे, जिसे चाहे सरदार बना दे
इन अखबारों की जमात में अब अदालतें नहीं होती





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