पानी मे आग लगाये बैठी है

है जितनी हूरें सबको हुस्न ए शाकी जलाये बैठी है
चाँद तारो को भी कतार ए खास में लगाये  बैठी है

आज फिर अपने पैरों को कासारे में डुबाये बैठी है
आज फिर वो लड़की पानी मे आग लगाये बैठी है

फ़क़त उसके रूठने को मैं  मुसलसल मनाता रहूँ
बस इसी  खातिर  वो लड़की मुँह फुलाये  बैठी है

एक  उसकी  ही  आंखों  में  सुकून  आता है मुझे
और वो जाने कितनी आफतें सर पे उठाये बैठी है

हमारी हर ग़ज़ल में  तसव्वुर ए  जाना है इलाही
वो न जाने किस संतरास का बुत बनाये बैठी है

जब जी  मे आया उसने उसने  जफ़ा  निभायी है
नादां अब हमसे वफ़ा ए  तवक्को  लगाए बैठी है


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