मोहन के मोह पे मोहाए गई राधिका
मंद मंद मुस्कान देख के माधव की,
मन ही मन में मोहाय गई राधिका
प्रेम का पतित पान पीय पीय के,
प्रिय पे ही प्रेम परछाए गई राधिका
मोहक राग सुन मोहन के मुरली की
सुधबुध अपनी भुलाए गई राधिका
कारे कजरारे कोरे नैन मातवारे कस
कंकड़ में कुसुम खिलाए गई राधिका
रच रही रूप रंग,रच रच अंग अंग
रूप के रमण में रिझायी गई राधिका
चंचला चकोर मुख चांदनी सा चितवन
चित केशव का चुराए गई राधिका।
लट घुंघराले लाल वाले मतवाले से
केशव को लगन लगाए गई राधिका
सत सत संच कर प्रेम की सुधा सर
श्याम के संग में समाए गई राधिका
श्याम रट रट खोजे ये नैन घट घट
तो जमुना के तट पाई गई राधिका
निर्मला निकुंज में नाच नाच नेहिका
नेह के नीर में नहाए गई राधिका
सज रही छन छन रूप रंग बन ठन
रास के रस में रिसाइ गई राधिका
जानी अंजानी बन पगली दीवानी
अहीर के छोरे पे छोहाए गई राधिका
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