एक शाकी, एक प्याला

एक है शाकी, एक है प्याला , एक ही तो ये मैखाना है
भटक कर इनकी राहो से, हमराही कहा तुझे जाना है।
ना छोड़ तू आना जाना, मदमस्ती भरी इन गलियों मे
ये पैमाना ही तो तेरा अपना है, बाकी तो सब बेगाना है


छम से बज कर कोई पायल, कानो तक आ जाती है
जैसे सावन देख कोई कोयल ,प्रियतम को भा जाती है
कुछ वैसी ही एक फ़िज़ा बहे, तेरे मैखाने की हवाओ में
जैसे सुगंध की कोई आंधी लिए,कस्तूरी एक आ जाती है

तेरी धुन में ही चलता रहता , राही ऐसा एक बंजारा है तेरी बातो में ही गुम शुम रहना , इसको सबसे प्यारा है
नशा तेरा जब चढ़ जाए इसपे तो अंजाम यही होता है
ना रहा ये अब उस रब का है,और ना ही ये अब हमारा है


देखे तेरे आंगन की बाती, दिल इसका वो परवाना है
बाट जोहे जो तेरी खातिर, ये तो  वो पगला दीवाना है।
न तोड़ तू इसके बेजान बुने अनजाने से उन ख्वाबो को
उनका बिखरा सा एक ढांचा  इसका तो आशियाना है


तेरी धुनि रमाये हर पल, तू ऐसा एक विष प्याला है
साधना इसकी है अनोखी, भाव भी इसका निराला है 
मैखाने की गली गली में , अब तो इसके नाम के चर्चे है
हर वक़्त चहकते जाम आये,गले पैंमानों की एक माला है




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