जो हम दोनों ने मांगा था
काश कि तुम वैसे होते जैसा हमने सोचा था
तो हम भी वैसे ही होते, जैसा तुमने चाहा था
न तुम्हे कोई गिला होती, न हमें कोई शिकवा
मिलता दोनों को वो, जो हम दोनों ने मांगा था
ना कोई बंदिश आई, न पीछे पड़ा जमाना था
फिर कैसे मानूं , बिछड़न वक्त का तकाज़ा था
ना रिश्ते खामोश होते, न ये दीवारे यूं चीखती
न चाँद झूठा होता, न उससे चांदनी यूं रूठती
मुकम्मल करती जो तुम अपने किये वादे सब
तो हमारी कहानी आज यूं अधूरी ना छूटती
माना , अधूरा ही रहना था अपनी कहानी को
पर रिश्तों की ये डोर यूं उलझ कर ना टूटती


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