कोई बहाना बना दे
रिंदों के शहर में मेरी मयकशी का अफसाना बना दे
यहाँ के दो चार शाकियों से मेरा भी याराना बना दे
मंदिरों और मस्जिदों के झगड़े कुछ यूं मिट जायेंगे
मेरे खुदा बस तू दोनों के बीच में एक मैखाना बना दे
जो लबो से लगाऊँ तो ताउम्र नशे में झूमता रहूँ मै
ज़ाम से न सही तू होंठों से ऐसा कोई पैमाना बना दे
हर मुसाफ़िर,हर मुहाजिर को जाम ए दीवाना बना दे
खुदा तू, शहर के रिंदों का भी कोई घराना बना दे
आतिश ए मशान में भी मयकशी का तराना बना दे
साक़ी तू इस तरह हमारी राख को ख़ज़ाना बना दे
बा खुदा मेरा दिल तेरी हर बात पर यकीन कर लेगा
बस तू अपना झूठ छुपाने के लिए कोई बहाना बना दे


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