पैमाने
मंजर मंजर घोर उदासी, एक तलाश है सीने में।
देखके पैमानों की हालत ,आये मज़ा ना पीने में।
इस सुबह से उन शामों तक हम फिरते रहे बेदर्द मैखानो में।
जाम से भरी जब बूंदे छलके,तो आये सुकूँ फिर जीने में।
मैखाने की इस खिड़की से एक हवा छिप आती है।
कुछ उनके दिल के नगमे वो हम तक पहुचाती है।
मधुशाला जैसे सुखमय लम्हे काश हमे फिर वापस मिलते,
इसी ख्वाब के रैन बसेरों में रात हमारी कट जाती है।
सुरूर है इसका ऐसा जैसे पायल छम से आ जाये,
जैसे देख सावन की घटा,नित मोर नशे में छा जाए
कुछ ऐसी ही मदहोशी है ,तेरी मधुशाला के इन पैमानो में,
जैसे तन्हा रहते परवाने को एक प्रियशी कोई भा जाए।
जीने की एक राह दिखाये, ये ऐसा एक दीवाना है।
ये हमने भी तो माना और ये तुमने भी तो माना है।
दिन भर भटके तू चाहे जितना, इस दुनिया की भूल भुलैया में,
शाम तलक थक कर तुझको , इस मदिरालय में आना है
बृजेश यदुवंशी
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