मुझ माही से मिलने आज मेरा आब आए,
लेन देन की रीत से होकर बेहिसाब आए
मुझ माही से मिलने आज मेरा आब आए,
जो हो तो इतनी रहमत करना मेरे इलाही
जमीं से मिलने फलक से उतर के चांद आए
जो तू फिर से होकर मिसाल ए खाब आए
तो सूखे हुए दरख़्तों पर फिर से गुलाब आए
तेरी झील की लौ से जिंदा रही उम्मीदें सारी
वरना मुमकिन है, जो सीने में इंकलाब आए
ये सजदे की रश्म आज भी निभाने दें साहेब
तो क्या हुआ जो हम आज पीकर शराब आए
अब चाहे वो आए या फिर उनकी याद आए
मगर सब उनके महफिल से जाने के बाद आए

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